Friday, October 31, 2014

ठहराव

click for source

सतत प्रवाह जीवन का मेरे, चलता रहता हर पल


परिवर्तन का परचम लेकर, बढ़ता रहता हर पल


 


मैंने इतना कब सोचा था, मैंने इतना कब जाना था


इतना आगे बढ़ जाऊँगा, अपनी खोज में खो जाऊंगा


 


मन में प्रश्न निरंतर उठते, पर अभाव में साहस के


भयाक्रांत हो उठता मैं, रुकने की बस आहट में


  परिवर्तन का आलिंगन कर, आगे बढ़ना सीखा मैंने


पर मैं सीख नहीं पाया, रुककर विश्लेषण करना खुद में      


 


परिवर्तन का कारण क्या है, बढ़ने की दिशा क्या है


इन प्रश्नों के उत्तर की महत्ता मैंने जानी होती,


काश डर से डरकर, की ना मनमानी होती


 


डर से आगे बढ़कर अब, खुद के आगे आ पाया


खुद का सामना करने से, अब कतराना ना भाया


 


अब तक के इस जीवन में, हो चुका बहुत सबका आकलन,


अब धोने की बारी है खुद पर लगे सारे लांछन

No comments:

Post a Comment